देवी त्रिजटा

 

 
 हर्ष वर्धन गोयल
सिंगापुर


हमारे पवित्र ग्रन्थ श्री रामचरित मानस अनेको विविधताओं से भरा एक अद्भुत ग्रन्थ है। इसके छोटे-बड़े सभी पात्र कुछ न कुछ विशेष गुणों से संपन्न हैं। आज हम एक ऐसी ही साध्वी की कथा कहेंगे जो राक्षस कुल में जन्म लेकर भी किसी देवी से काम नहीं थीं। 
सुन्दरकाण्ड और लंका काण्ड में सीता-त्रिजटा संवाद के रूप में त्रिजटा का जिस प्रकार वर्णन आया है, उन संवादों में ही त्रिजटा के चरित्र की विशेषताएँ स्पष्ट प्रतिबिंबित होती हैं। त्रिजटा जन्म से भले ही राक्षसी थी किन्तु वह एक श्री रामचरणानुरागी, धर्मपरायणा, व्यवाहरिक, व्यवहार-निपुण और विवेकशीला स्त्री थी। 
रावण, अपने मद में चूर, दसों दिशाओ में अपना अधिपत्य जमाने लगा था उसने मध्य देश के राजा विद्युत जीव्हा , जो उसका बहनोई था उसे मार दिया, किष्किंधा में राजा बलि से कूटनीतिज्ञ सम्बन्ध स्थापित कर लिए। दक्षिण के सारे द्वीपों– माली, हेति (वर्तमान में अफ्रीका) सुमात्रा इत्यादि महाद्वीपों पर अधिपत्य स्थापित कर लिया और वह उत्तर की ओर बढ़ने लगा था। इसी कड़ी में उसने अपने अग्रज कुबेर से लंका को छीना उत्तर की तरफ बढ़ते हुए भारत भूमि के दक्षिण के कई क्षेत्रों को अपने आधिपत्य में ले लिया था और अपने चचरे भ्राताओं खर और दूषण को अधिपति बना दिया। 
ऋषि, मुनि और जन मानस रावण के अत्याचारों से त्राहिमान हो प्रभु से सहायता की याचना करने लगे। तब कृपानिधान प्रभु ने अयोध्या में महाराजा दशरथ के घर जन्म लिया। रानी कैकेई, जो महारज दशरथ से साथ युद्ध में साथ देती थीं। वह रावण की विस्तारवादी नीतियों को जानती थी,  देवताओं ने जब देखा कि भगवान राम का राजतिलक होने जा रहा है तो उन्होंने अपनी अप्सरा जो मंथरा के रूप में कैकेई की प्रमुख प्रबंधिका थी, के द्वारा एक सुनोयोजित योजना के अनुसार, असुरों का नाश करने के लिए प्रभु राम को वन में भेजा।
 इस प्रकार श्री राम जी ने पूर्व या पश्चिम न जाकर दाक्षिण की ओर गमन किया और एक-एक करके सभी वनों को राक्षसों से मुक्त किया। अपने घटते आधिपत्य को देख, रावण तिलमिला गया और श्री राम के चरित्र हरण के लिए अपनी बहन सूपर्णखा को भेजा। और  जब उसका कोई वार नहीं चला तो उसने छल से माँ सीता का हरण कर लिया। 
कहते हैं मन्दोदरी बड़ी समझदार स्त्री थी। उसे पाप और पुण्य का ज्ञान था, उन्होंने रावण को सीता माता के साथ महल में प्रवेश की अनुमति नहीं दी। सीता माता के लिए उसने अशोक वाटिका का स्थान चुना और सीता माता की देखरेख के लिए त्रिजटा राक्षसी को दल प्रमुख के रूप में नियुक्त किया क्योंकि मन्दोदरी जानती थी कि त्रिजटा एक ऐसी साध्वी धर्मपरायण है जो राक्षसी कुल की होते हुए भी सत्व गुणों से पूर्ण है।  इंडोनेशिया में प्रचलित "काकाविन रामायण" के अनुसार त्रिजटा, अशोक वाटिका में नियुक्त, रावण की तीन सौ राक्षसियों की दल प्रमुख थी।
त्रिजटा कोई साधारण स्त्री अपितु भक्त विभीषणजी की पुत्री थी। इनकी माता का नाम शरमा है। प्रभु भक्ति उसका पैतृक गुण था। लंका की अशोक वाटिका में सीताजी के पहरे पर पहरेदार कम और सहचरी अधिक थी। तीन सौ से अधिक राक्षसियों में केवल त्रिजटा ही थी, जो सीता का उत्साह बढ़ाती थी जो राक्षसियों से भी बचाती थी और साथ में ढाँढस भी बढ़ाती रहती थी। 
जब सीता माता पर रावण की एक न चली तो सीताजी को डराने के लिये उसने भय और त्रास का सहारा लिया था और राक्षसियों को ऐसा ही करने की आज्ञा दी। राक्षसियाँ उन्हें तरह-तरह के उपद्रव कर परेशान करती थीं। सीताजी का दुख दूना हो गया क्योंकि राक्षसियाँ नाना प्रकार के भयंकर रूप बना बनाकर उन्हें डराने धमकाने लगी। 

व्यवहार में निपुण त्रिजटा के लिये यह असह्य हो गया। उस ने एक विवेकपूर्ण युक्ति निकाली और एक भयानक स्वप्न कथा की कल्पना की।
त्रिजटा ने उन सब राक्षसियों को बुलाकर से कहा कि मैंने एक स्वप्न देखा है। स्वप्न में मैंने देखा कि एक विशालकाय वानर ने लंका जला दी है। राक्षसों की सारी सेना मार डाली गयी और रावण नग्न अवस्था में, गधे पर सवार है। लंका से बाहर जा रहा है उसके सिर मुँडे हुए हैं, बीसो भुजाएँ कटी हुई हैं। मानो वह अब लंका का राजा नहीं रहा और लंका का नया राजा विभीषण बन गया है। 
सभी राक्षसियों को डराते हुए उसने बोला कि यदि दंड से बचना है तो सब सीता जी की सेवा करके अपना कल्याण कर लो। उन्होंने राक्षसियों से कहा कि वह निश्चय के साथ कहती है कि यह स्वप्न कुछ ही दिनों में सत्य होकर रहेगा। उसके वचन सुनकर, वे सब राक्षसियाँ डर गईं और जानकी जी को डराना और सताना बंद कर दिया। इस प्रकार जहाँ त्रिज़टा एक भविष्यदर्शिनी सिद्ध हुई वहीं उसने व्यवहार कुशलता से, भय दिखाकर राक्षसियों को भी भयभीत कर दिया।
महावीर हनुमान जी ने भी जब अशोकवाटिका में सीता जी की देखा तो उनको अपना परिचय देने का कोई उपाय ही नहीं सूझा। वे सीताजी के रूप और स्वभाव दोनों ही से अपरिचित थे। किन्तु जब उन्होंने त्रिजटा को प्रभु का गुणगान करते देखा और सीता माता को प्रभु का गुणगान सुन आनंदित होते देखा तो उन्होंने भी वही युक्ति अपनाई और सीताजी को राम गुणगान सुनाया। प्रभु गुणगान सुनने से ही सीता जी को सांत्वना मिली। उन्होंने हनुमान् जी से उनका परिचय पूछा और हनुमान जी ने परिचय स्वरूप मुद्रिका प्रस्तुत की
महावीर हनुमान जी द्वारा फल खाने की इच्छा प्रकट करना  और अशोक वाटिका को उजाड़ देना, एक बहुत प्रबल रणनीति थी जिसमे छोटे बल प्रयोग द्वारा शत्रु की शक्ति का अनुमान लगया जाता है। त्रिजटा हनुमान जी से बहुत प्रभावित हुई। 
जब रावण ने कभी माया के द्वारा सीताजी को डराने की कोशिश की तब त्रिजटा ने सीता जी को वास्तविक बात बताई। इसके अलावा रावण ने कई बार क्रोधवश सीता जी को मारना चाहा, तब भी त्रिजटा ने रावण को समझाया और सीता की रक्षा की। वह त्रिजटा ही थी, जिसने सीता जी ये भी कहा कि उसने सपना देखा है और उसके अनुसार युद्ध में विजय श्री राम की ही होगी। 
युद्ध की घोषणा हो चुकी थी दोनों सेनाएं आमने सामने थी, लंका में भयंकर युद्ध आरंभ हुआ,  त्रिजटा अपने सूत्रों से मिल रही सारी सटीक जानकारियों को सीता जी तक पहुँचाती थी। जब युद्ध के दौरान राम और लक्ष्मण पर नागपाश का प्रकोप हुआ तो माता सीता जी विचलित हो उठीं। वे देह त्याग के लिए त्रिजटा से अग्नि की याचना करने लगीं और दुखी मन से त्रिजटा से कहती हैं कि अब इस जीवन का कोई प्रयोजन नहीं, मुझे भी संसार त्याग देना चाहिए। त्रिजटा माता सीता की मनोदशा समझती थी, ऐसे में त्रिजटा ने बुद्धिमानी से सीता की बात ये कहकर टाल दी थी कि इतनी रात्रि के इस समय अग्नि नहीं मिलेगी। वह यह भलीभांति जानती है कि किसी और प्रकार की सांत्वना उस समय काम नहीं आएगी और इस प्रकार एक व्यवहारिक परामर्शदात्री एवं प्राणरक्षिका का काम किया है। यही कारण है कि सीताजी ने त्रिज़टा के लिया माता शब्द का प्रयोग किया।
युद्ध समाप्त हो गया। असत्य पर सत्य की विजय हुई, आततायी रावण मारा गया, प्रभु राम लंका को उपनिवेश न बनाकर, रावण के भाई विभीषण को लंका का राजा घोषित किया।  कहते हैं कि जीत के बाद त्रिजटा सीता माता के साथ पुष्पक विमान से अयोध्या भी गई थी। 
थाईलैंड की रामायण "रामाकीएन" विभीषण अर्थात फिपेक की पुत्री त्रिजटा यानि बेंचाकेई की एक अनोखी कथा का वर्णनं मिलता है।  कथानुसार जब अयोध्या में, माता सीता ने, त्रिजटा से प्रसन्न हो , कुछ माँगने के लिए पूछा, तो त्रिजटा जी लज्जा वश, माँ सीता को अपने एकतरफा प्रेम का भेद बता दिया कि किस प्रकार वह हनुमान जी बल से प्रभावित है। हनुमान जी ने अकेले ही अशोक वाटिका में राक्षसों की सेना का संहार कर दिया था और युद्ध में उन्होंने जो वीरता दिखाई थी, जब लक्ष्मण मूर्क्षित हो गए थे तो हनुमान जी पूरा पहाड़ ले आये, हनुमान जी को मन ही मन वह अपना ह्रद्येश मान चुकी थी।
मलेशिया की भाषा में लिखी मलय रामायण में , जिसमें त्रिजटा को सेरी देवी के रूप में जाना जाता है, के अनुसार, युद्ध के बाद विभीषण ने भी माँ सीता के साथ हनुमान जी उनका हाथ अपनी बेटी त्रिजटा के लिए माँगा था ताकि उनके वश में भी हनुमानजी जैसा पुत्र प्राप्त हो। माँ सीता ने हनुमान जी से यह विशेष प्रस्ताव रखा, हनुमान जी ने माँ सीता का सम्मान किया वे सहमत हो गए लेकिन उनकी एक प्रार्थना थी कि वे मात्र एक माह ही त्रिजटा के साथ विवहित जीवन व्यतीत करेंगे। विभीषण की बेटी त्रिजटा का हनुमान जी विवाह हुआ। कहते हैं कि माह पश्चात हनुमान जी अयोध्या चले गए, त्रिजटा ने एक बेटे को जन्म दिया जिसे असुरपद कहा जाता है और भाषा  मलेशिया में हनुमान तेगनग्गा, वह शरीर से राक्षस जैसा लेकिन उसका मुख वानर जैसा था। जावा औऱ सूडान में रामायण के कठपुतली नाटकों में त्रिजटा को हनुमान जी  की पत्नी के रूप में दिखाया जाता है। 
क्या हम लोगों ने उस देवी तुल्य स्त्री को भुला दिया?  नहीं, हमारी कर्म प्रधान संस्कृति में हर उस व्यक्ति को, स्त्री को सम्मान मिला है जिसने आदर्शों की स्थापना की है, आप सहस्रों वर्ष बीत जाने पर भी वाराणसी में त्रिजटा का मंदिर है, जो प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर के निकट स्थित है। मान्यता अनुसार पुष्पक विमान से लंका से अयोध्या जाते समय, सीता माता ने त्रिजटा के साथ काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन किये थे और प्रभु ने त्रिजटा की आस्था को देखकर माता सीता ने उन्हें यहाँ ये आशीर्वाद दिया था कि त्रिजटा की पूजा वहाँ एक देवी के रूप में की जाएगी। आज भी इस मंदिर में त्रिजटा की प्रतिदिन पूजा होती है। महिलाएँ इस मंदिर में अपनी मनोकामना पूरी होने के लिए आती हैं। यहाँ त्रिजटा को मूली और बैंगन का चढ़ावा चढ़ाया जाता है।  इसी प्रकार त्रिजटा का एक मंदिर उज्जैन में भी है, जो बालवीर हनुमान मंदिर परिसर में है। यहां देवी की तीन दिनों की विशेष पूजा होती है, जो कार्तिक पूर्णिमा से शुरू होती है। कहते है हमारी संस्कृति आकाश गंगा से भी प्राचीन है, समय के साथ यह संस्कृति धुँधली न पड़ जाए, आओ इसे संजो लें, आओ ऐसे संजो लें।

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